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सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

मुद्दत से बैठा हूँ…….!!


गोते लगाता रहा
लफ़्ज़ों के समुन्दर में
मिला ना कोई लफ्ज़ जो तेरे दिल के ज़रा करीब हो

पलटता रहा
पुराने खतों के ढेर कों
मिला ना कोई लफ्ज़ जिस में छिपा मेरा नसीब हो

गुदगुदाता रहा
उँगलियों से वीणा के हर तार कों
मिला ना कोई सुर जिस में तेरी खनकती हँसी शरीक हो

बही खातों के
सारे पन्ने छान लिए
मिला ना कोई खाता जिसमे उधार तेरी प्रीत हो

झाँक लिए
सारे झरोके तेरी यादों के
मिला ना कोई भीगा लम्हा बंद साँसों में हिचकियों का यकीन हो

मुद्दत से बैठा हूँ
मयखाने में जाम लिए
ज़ब्त करता रहा अश्कों कों छलकने से कहीं शराब की तोहीन हो

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

 “कशमकश”…………




आसमाँ पाने की ज़िद मुख़्तसर  हुई ज़ॅमी

हसरतों को अभी और इम्तिहाँ का यकीं



खंजर का हुनर सीने के पार जाना

सलतनत-ए-जुनून का यूँ क़तल होता नही



शीशे की नफ़ासत गिर के चटकना

हौसला अपना, कोई मील का पत्थर नही



तूफां का गरूर ज़मींदोष हो आशियाना

बुनियाद मेरे मकान की इतनी कमज़ोर भी नही



ख्वाबों की हद्द, बंदिशो की मंज़र-कशी

नींद अपनी भी हुज़ूर इतनी कच्ची नही

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

“पर कतरता रहता हूँ”



शराब की फ़ितरत पाई है मैने
इसी लिए पैमाने से छलक्ता रहता हूँ
गुस्ताख आँखों से वाकिफ़ हूँ
इसी लिए दिल की तरह धड़कता रहता हूँ


लड़कपन की  फ़ितरत पाई है मैने
इसी लिए लहरों की तरह बहकता रहता हूँ
सीने मे दबी आग से वाकिफ़ हूँ
इसी लिए मोम की तरह पिघलता रहता हूँ


राख मे दबे शोले की फ़ितरत पाई है मैने
इसी लिए हर वक़्त सुलगता रहता हूँ
खुद मे खुद की तलाश से वाकिफ़ हूँ
इसी लिए सुनसान सड़क पर चलता रहता हूँ


परिंदो सी फ़ितरत पाई है मैने
आसमान छूने की कोशिश करता रहता हूँ
अपनी बेवजेह की उड़ान से वाकिफ़ हूँ
इसी लिए अपने पर कतरता रहता हूँ

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

“इबादत सी है” 


शायरी एक शरारत सी है
इब्तेदा–ए–इश्क़ की इनायत सी है     


लबों पर बुदबुदाती बंदिश
किसी सब्र से गुफ्तगू की इबारत सी है


हाथ से फिसलती रेत और ज़ुबान पत्थर
किसी ख्वाब की ताबीर से बग़ावत सी है


सर्द हवाओं मे गेसुओं की आवारगी
किसी रहगुज़ार के रुख्स्त सी है


चिराग़ की रोशनी मे दमकते रुखसार
किसी तलबगार की इबादत सी है


खामोश ओ गुम नज़रे
किसी ज़लज़ले की आहट सी है


शायरी एक शरारत सी है
दास्तान-ए-मुहब्बत की लिखावट सी है