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शनिवार, 19 नवंबर 2011

बस यही मुझे याद नहीं....!


मुझे आज भी याद है
जब माँ बाबा को
किसी बिचौले ने
तुम्हारा और मेरा रिश्ता
सुझाया था
फिर मुझे तेरा फोटो
दिखाया था

मुझे आज भी याद है
मंदिर के प्रांगण में
सांझ ढले
देखने दिखाने का
बरसों पुराना तरीका
अपनाया था

मुझे आज भी याद है
मैंने जिद्द की थी
तुझ से चंद बातें
करने की, और
मुश्किल से तेरे बाबा को
मनाया था

मुझे आज भी याद है
गुलहड़ की झाड़ के पीछे
तेरा हाथ पकड़
कहा था मुझे पसंद हो
और मैं..??
तूने भी हौले से हाँ में अपना सर
झुकाया था

मुझे आज भी याद है
मंदिर से वापिस निकलते हुए
कनखियों से तुझे निहारा था
और तूने खुद को अपनी
झुकी हुई पलकों में
छुपाया था

मुझे आज भी याद है
मेरे घर की चौखट पर
पाँव धरते ही
तेरी पायल के हर घुंघरू ने
मेरे सपनों की चांदनी का गीत
गुनगुनाया था

वो तुम्हारी तस्वीर
वो चंद लम्हे
वो हाथों का स्पर्श
वो सर का झुकाना
वो नजरें चुराना
वो चांदनी का गीत
कब ज़िन्दगी का कारवां बन गए
बस यही मुझे याद नहीं

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

चिंदिया उड़ाने से क्या होगा



ख़तों को अब संभाल कर रखने से क्या होगा
दर्द को यूँ समेट कर रखने से क्या होगा

खुली हवा में ख़तों कों सांस ले लेने दो
यूँ पोटली में समेट कर रखने से क्या होगा

ख़त संजीदा लफ़्ज़ों से लिपट कसमसाते होंगे
यूँ आरजूओं के परिंदे क़ैद करने से क्या होगा

साल-हा-साल गुबार-ए-ज़ख्म थे शुमार ख़तों में
यूँ बरसों कों लम्हे में बदलने से क्या होगा

कहा था ना खतों - किताबत से दूरी रखो
यूँ छत पर अब चिंदिया उड़ाने से क्या होगा

रविवार, 18 सितंबर 2011

आवारा घूमना अच्छा लगता है


अब दिन में भी आँखे बंद रखना अच्छा लगता है
तुझे हर वक़्त ख्यालों में रखना अच्छा लगता है

कागज़ पर लफ़्ज़ों को बस तेरे लिए ही तराश्ता हूँ
जज़्बात बिखर ना जाएँ बंद होंठो से गुनगुनाना अच्छा लगता है

दिन भर बदहवास और कुछ मसरूफ रहता हूँ
मगर घर में अकेले तेरी तस्वीर से गुफ्तगू करना अच्छा लगता है

शीशे के चटकने से अब भी सिहर जाता हूँ
तेरे आखरी ख़त में भेजे सलाम पर हाथ का उठ जाना अच्छा लगता है

टुकड़े टुकड़े दिल के ज़र्रों को सहेजता रहता हूँ
जुनून उतर ना जाये तेरी चाहत का ज़ख्मों को कुरेदना अच्छा लगता है

मंजिल की तलाश में अब वक़्त ज़ाया नहीं करता हूँ
सांझ ढले तेरी गली में बस यूँ ही आवारा घूमना अच्छा लगता है

विनोद.....

रविवार, 31 जुलाई 2011

तेरी याद का फूल


आज फिर ज़हन के
इन बंद दरीचों के तले
दिल में सोये हुऐ
अहसास ने करवट बदली
और चुपके से महक उठा
तेरी याद का फूल

ज़ख्म ने आंख मली
याद ने करवट बदली
गुनगुनाने लगे
मज़रूह तम्मनाऔ के लब
रूह के जिस्म से नग़मात के
धारे फूटे

वक्त की धूल में डूबे हुऐ
यादों के चिराग़
तेरे चेहरे की रौनक को
ज़िला देने लगे

मेरी पलकों से टपकते हुऐ
अश्कों के मोती
मुझे मेरी मोहब्बत का
सिला देने लगे


मुद्दतों बाद...

इक अख़बार के पन्ने पे
मुझे तेरी तसऽवीर नज़र आई
किसी और के साथ

तेरे पहलू में कोई
नौजवां बैठा था
नये तेवर, नये अंदाज़,
नये तौर के साथ

करवटें लेने लगी
दर्द की लहरें दिल में
यादों की राख फिज़ां में
बिखरने सी लगी

ज़हन में गूंज उट्ठी
तेरी खनकती हुई आवाज़
तेरी तहरीर निगाहों में
उभरने सी लगी

तेरी तस्वीर ने यह राज़
मगर फाश किया
कि लोग किस तरह
बदल जाते हैं धीरे धीरे
मोम की तरह बदन
उनका पिघल जाता है
और इक नये सांचे
ढल जाते हैं धीरे धीरे

आज फिर ज़हन के
इन बंद दरीचों के तले
दिल में सोये हुऐ
अहसास ने करवट बदली
और चुपके से महक उठा
तेरी याद का फूल


विनोद………..

रविवार, 24 जुलाई 2011

लफ्ज़ बदल जाया करते थे


हर लम्हे के साथ खुद बखुद
मेरी नज़्म के लफ्ज़ बदल जाया करते थे


सावन के महीने में यही लफ्ज़
बारिश की बूंदों में बदल जाया करते थे


सूरज की बे - इन्तहा तपिश में
दरख्त के साये में बदल जाया करते थे


अमावस के घुप अंधेरों में यही लफ्ज़
चिरागों की रौशनी में बदल जाया करते थे


बियाबान रास्तों पे जब भी हुआ अकेला
लफ्ज़ रहगुज़र में बदल जाया करते थे


दिलबर के ज़िक्र की महक से यह लफ्ज़
पाज़ेब की झंकार में बदल जाया करते थे


विनोद.....

सपनो के घाव


वो औरत
कहाँ से पाए दो ह्रदय
एक क्षण पाषाण
दुसरे क्षण ममता
जिस को मैं और मेरी बहना
माँ कहती थी

दिन भर
पत्थरों को तोड़
शाम ढले
रोटी के चंद टुकड़े
बीन लाया करती थी

माँ की तो आधा पेट खा कर
सोने की आदत सी थी
मुट्ठी में बंद
सपनो के घाव
सहने की विरासत सी थी

मुझे तो
मेरी माँ ने
उधार मांग
चांदी के
चम्मच से
पहला निवाला खिलाया था

नियति बदली नहीं
पत्थरों के शहर में
निवाला जुटाने में
फिर उधार चुकाने में
वही किस्सा दोहराया था
माँ को आधा पेट खा कर सुलाया था

विनोद.....

जन गण मन


क़तल डाका और चीरहरण
हर तरफ बस चरित्रहनन
कलम भी बेबस और सन्न
चुप्पी, चीखें, घुटन का संग
हर तरफ सन्नाटे का काला रंग
जकड़े जबड़े , सबके मुखबन्द
हर हाथ में बस लाठी बल्लम
जिंदा लाशों की सड़ी सी गंध
सुबक रहा सारा जन गण मन


चुप चुप सी चूड़ी की छन छन
गुमसुम सी पायल की छम छम
कम्पित धरती का , कण कण
चहूँ और बादल की , घन घन
ह्रदय पर हथोड़ो की , ठन ठन
काला धन , खनके खन खन
भ्रष्ट हमाम में सब नंग धड़ंग
तम में विसर्जित , क्षण क्षण
सुलग रहा सारा जन गण मन


बन्दूको के साए में अब चलते शासन
द्रोपदियो के चीरहरण करते दुशासन
सीताओं के हरण करते हज़ारों रावण
मुल्कों का सौदा करते यह जयचंद
खो गए अंधियारे में कर्ण विभीषण
कमरे के अंदर सुरा पंडाल में सत्संग
विद्या का व्यापार करते यह गुरुजन
तड़प रहा सारा जन गण मन

विनोद.....