यह विजेट अपने ब्लॉग पर लगाएँ

रविवार, 31 जुलाई 2011

तेरी याद का फूल


आज फिर ज़हन के
इन बंद दरीचों के तले
दिल में सोये हुऐ
अहसास ने करवट बदली
और चुपके से महक उठा
तेरी याद का फूल

ज़ख्म ने आंख मली
याद ने करवट बदली
गुनगुनाने लगे
मज़रूह तम्मनाऔ के लब
रूह के जिस्म से नग़मात के
धारे फूटे

वक्त की धूल में डूबे हुऐ
यादों के चिराग़
तेरे चेहरे की रौनक को
ज़िला देने लगे

मेरी पलकों से टपकते हुऐ
अश्कों के मोती
मुझे मेरी मोहब्बत का
सिला देने लगे


मुद्दतों बाद...

इक अख़बार के पन्ने पे
मुझे तेरी तसऽवीर नज़र आई
किसी और के साथ

तेरे पहलू में कोई
नौजवां बैठा था
नये तेवर, नये अंदाज़,
नये तौर के साथ

करवटें लेने लगी
दर्द की लहरें दिल में
यादों की राख फिज़ां में
बिखरने सी लगी

ज़हन में गूंज उट्ठी
तेरी खनकती हुई आवाज़
तेरी तहरीर निगाहों में
उभरने सी लगी

तेरी तस्वीर ने यह राज़
मगर फाश किया
कि लोग किस तरह
बदल जाते हैं धीरे धीरे
मोम की तरह बदन
उनका पिघल जाता है
और इक नये सांचे
ढल जाते हैं धीरे धीरे

आज फिर ज़हन के
इन बंद दरीचों के तले
दिल में सोये हुऐ
अहसास ने करवट बदली
और चुपके से महक उठा
तेरी याद का फूल


विनोद………..

रविवार, 24 जुलाई 2011

लफ्ज़ बदल जाया करते थे


हर लम्हे के साथ खुद बखुद
मेरी नज़्म के लफ्ज़ बदल जाया करते थे


सावन के महीने में यही लफ्ज़
बारिश की बूंदों में बदल जाया करते थे


सूरज की बे - इन्तहा तपिश में
दरख्त के साये में बदल जाया करते थे


अमावस के घुप अंधेरों में यही लफ्ज़
चिरागों की रौशनी में बदल जाया करते थे


बियाबान रास्तों पे जब भी हुआ अकेला
लफ्ज़ रहगुज़र में बदल जाया करते थे


दिलबर के ज़िक्र की महक से यह लफ्ज़
पाज़ेब की झंकार में बदल जाया करते थे


विनोद.....

सपनो के घाव


वो औरत
कहाँ से पाए दो ह्रदय
एक क्षण पाषाण
दुसरे क्षण ममता
जिस को मैं और मेरी बहना
माँ कहती थी

दिन भर
पत्थरों को तोड़
शाम ढले
रोटी के चंद टुकड़े
बीन लाया करती थी

माँ की तो आधा पेट खा कर
सोने की आदत सी थी
मुट्ठी में बंद
सपनो के घाव
सहने की विरासत सी थी

मुझे तो
मेरी माँ ने
उधार मांग
चांदी के
चम्मच से
पहला निवाला खिलाया था

नियति बदली नहीं
पत्थरों के शहर में
निवाला जुटाने में
फिर उधार चुकाने में
वही किस्सा दोहराया था
माँ को आधा पेट खा कर सुलाया था

विनोद.....

जन गण मन


क़तल डाका और चीरहरण
हर तरफ बस चरित्रहनन
कलम भी बेबस और सन्न
चुप्पी, चीखें, घुटन का संग
हर तरफ सन्नाटे का काला रंग
जकड़े जबड़े , सबके मुखबन्द
हर हाथ में बस लाठी बल्लम
जिंदा लाशों की सड़ी सी गंध
सुबक रहा सारा जन गण मन


चुप चुप सी चूड़ी की छन छन
गुमसुम सी पायल की छम छम
कम्पित धरती का , कण कण
चहूँ और बादल की , घन घन
ह्रदय पर हथोड़ो की , ठन ठन
काला धन , खनके खन खन
भ्रष्ट हमाम में सब नंग धड़ंग
तम में विसर्जित , क्षण क्षण
सुलग रहा सारा जन गण मन


बन्दूको के साए में अब चलते शासन
द्रोपदियो के चीरहरण करते दुशासन
सीताओं के हरण करते हज़ारों रावण
मुल्कों का सौदा करते यह जयचंद
खो गए अंधियारे में कर्ण विभीषण
कमरे के अंदर सुरा पंडाल में सत्संग
विद्या का व्यापार करते यह गुरुजन
तड़प रहा सारा जन गण मन

विनोद.....

शनिवार, 23 जुलाई 2011

फिर मैं कैसे दीप जलाऊं


दर दर दीप जला कर
तुम ने अपनी अमावस पूनम कर ली
बहुतेरे आँगन अब भी ऐसे
जहां दीप जला ना मनी दिवाली
फिर मैं कैसे दीप जलाऊं

नभ ने सब तारे
जड़ डाले तेरे सतरंगे आँचल में
वीणा की झंकार सुरीली
बस रे गयी तेरी पायल में

अमावस से जो चन्दा रूठा
तेरे माथे की बिंदिया बन बैठा
बहुतेरे अब भी ऐसे
हाथों में रची ना मेहंदी
माथे पर सजी ना चन्दन रोली
फिर मैं कैसे दीप जलाऊं

भ्रमर सारे मधुरस
घोल गए तेरे अधरों में
मधुशाला की हाला
डोल गयी तेरे नयनों में
पुष्पों की खुशबू
बस रे गयी तेरी साँसों में

बहुतेरे अब भी ऐसे
आँखों के पनघट रो रो रीते
मन पुस्तक के पन्ने खाली
फिर मैं कैसे दीप जलाऊं

विनोद.....

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

निबंध


“आँखों देखे मेले का हाल”
स्कूल में आठवीं क्लास में
मास्टर जी अक्सर यह निबंध
लिखवाया करते थे
एक कल्पना कों
लिखना होता था
शब्दों में
दो पन्नों में

आज बरसों बाद
वैसी ही कल्पना
तेरे और मेरे संबंधों
तेरे और मेरे बीच के
खोखले होते रिश्तों पर
फिर एक निबंध लिखना है

मेले और रिश्तों में
तेरे मेरे रिश्तों में
काफी समानताएँ हैं
पल दो पल
मिलना जुलना
दुआ सलाम
और फिर अपने अपने
खिलोनों से
ख्यालों से
रास्ते भर गुफ्तगू

विनोद.....

सोमवार, 18 जुलाई 2011

मंजिल कोई मील का पत्थर नहीं होती


मंजिल कोई
मील का पत्थर
नहीं होती
मुसाफिर की कोई
मंजिल नहीं होती

मंजिल तो बस
एक पड़ाव है
अतीत आज और भविष्य
की संकरी गलियों से
गुज़रते
ज़िन्दगी के रास्तों का

उन रास्तों का
जिन्होंने मुझे
अत्तीत से निकल
आज के पड़ाव तक
हर क़दम
नया अहसास जगाया

थके जब
पाँव मेरे
तलवों को सहलाया
बस बढ़ते चलो का
हर बार
नया गीत गुनगुनाया

विकट बाधओं में
भटक गया जब
इन्ही रास्तों ने
मेरा साथ निभाया
हर बार
नया विश्वास जगाया

रास्ता कोई
बदलते मौसम की
सहर नहीं
सागर में सिमटी
लहर नही

रास्ता एक दृष्टि एक सृष्टि है
नए पगध्वनी के संगीत का
संगीत की खुश्बू
परिधि में क़ैद नहीं होती
इरादों की
कोई मंज़र नहीं होती
मंजिल कोई
मील का पत्थर नहीं होती

विनोद.....