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शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

 “कशमकश”…………




आसमाँ पाने की ज़िद मुख़्तसर  हुई ज़ॅमी

हसरतों को अभी और इम्तिहाँ का यकीं



खंजर का हुनर सीने के पार जाना

सलतनत-ए-जुनून का यूँ क़तल होता नही



शीशे की नफ़ासत गिर के चटकना

हौसला अपना, कोई मील का पत्थर नही



तूफां का गरूर ज़मींदोष हो आशियाना

बुनियाद मेरे मकान की इतनी कमज़ोर भी नही



ख्वाबों की हद्द, बंदिशो की मंज़र-कशी

नींद अपनी भी हुज़ूर इतनी कच्ची नही

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

“पर कतरता रहता हूँ”



शराब की फ़ितरत पाई है मैने
इसी लिए पैमाने से छलक्ता रहता हूँ
गुस्ताख आँखों से वाकिफ़ हूँ
इसी लिए दिल की तरह धड़कता रहता हूँ


लड़कपन की  फ़ितरत पाई है मैने
इसी लिए लहरों की तरह बहकता रहता हूँ
सीने मे दबी आग से वाकिफ़ हूँ
इसी लिए मोम की तरह पिघलता रहता हूँ


राख मे दबे शोले की फ़ितरत पाई है मैने
इसी लिए हर वक़्त सुलगता रहता हूँ
खुद मे खुद की तलाश से वाकिफ़ हूँ
इसी लिए सुनसान सड़क पर चलता रहता हूँ


परिंदो सी फ़ितरत पाई है मैने
आसमान छूने की कोशिश करता रहता हूँ
अपनी बेवजेह की उड़ान से वाकिफ़ हूँ
इसी लिए अपने पर कतरता रहता हूँ

सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

“इबादत सी है” 


शायरी एक शरारत सी है
इब्तेदा–ए–इश्क़ की इनायत सी है     


लबों पर बुदबुदाती बंदिश
किसी सब्र से गुफ्तगू की इबारत सी है


हाथ से फिसलती रेत और ज़ुबान पत्थर
किसी ख्वाब की ताबीर से बग़ावत सी है


सर्द हवाओं मे गेसुओं की आवारगी
किसी रहगुज़ार के रुख्स्त सी है


चिराग़ की रोशनी मे दमकते रुखसार
किसी तलबगार की इबादत सी है


खामोश ओ गुम नज़रे
किसी ज़लज़ले की आहट सी है


शायरी एक शरारत सी है
दास्तान-ए-मुहब्बत की लिखावट सी है


मंगलवार, 26 जनवरी 2016

“तेरे बगैर”



शाम-ए-सुकून ग़ुज़र गयी
आज फिर तेरे बगैर
धड़कना सीख लिया दिल ने
आज फिर तेरे  बगैर

चिरागो के जलने का वक़्त आ गया
उदास तूफ़ान थमने का वक़्त आ गया
नसों मे लहू जमने का वक़्त आ गया 
आज फिर तेरे बगैर 

दिल को समझाया काफ़ी देर तलक
लबों ने मुस्कराया काफ़ी देर तलक 
आईने से की गुफ्तगू काफ़ी देर तलक 
आज फिर तेरे बगैर 

 मासूम खवाईशों को सम्भहाल के रक्खा 
महरूम रिवायतो को संभाल के रक्खा 
मज़लूम हसरतों को संभाल के रक्खा 
आज फिर तेरे बगैर 

उम्मीदों का सफ़र और लफ़्ज़ों की गर्मी 
सर्द फ़िज़ाओं मे, सुलगते अहसास, की गर्मी 
ज़ायका गमो का, लज़्ज़त विसाल की गर्मी 
आज फिर तेरे बगैर 

शब-ए-अज़ाब गुज़र गयी 
आज फिर तेरे बगैर 
सिमटना सीख लिया दिल ने 
आज फिर तेरे बगैर

रविवार, 22 जनवरी 2012

संघर्ष.......!!

तुम समुन्दर का किनारा हो
मैं एक प्यासी लहर की तरेह हूँ 
तुम्हें चूमने के लिए उठता हूँ 
 तुम चट्टान की तरेह हो 
वैसी ही खड़ी रहती हो 
मैं हर बार तुम्हें बस छू कर लौट जाता हूँ ...!!

शनिवार, 21 जनवरी 2012

मदिरा छलकी

भाप ..!!
जैसे अंतर से उठती
बेशुमार कणों
की मौन सिसकी

उष्मा ..!!
जैसे अंतर से उठती
सुलगते सपनो
की ज्वाला भभकी

तृष्णा ..!!
जैसे अंतर से रिसती
द्रवित मन
की मदिरा छलकी

खुश्बू ..!!
जैसे अंतर से महकी
तन की
इक इक नस चटकी

वेदना ..!!
जैसे अंतर से लिपटी
आँखों के पोखर
में काई सी जमी विरक्ति

क्षुधा ..!!
जैसे अंतर से बहती
शुष्क होंठों पर
प्रियतम के प्रेम की थपकी

तलाश.......!!!


कागज़ पर रेंगती कलम
रौंदती चली गयी
हर लफ्ज़ कों

तलाश थी ...!!

उस लफ्ज़ की
बन जाए इन्द्रधनुष
छलक कर सारी स्याही

तलाश थी ...!!

उस लफ्ज़ की
बन जाए अंगार
तड़प कर सारी स्याही

तलाश थी बस ...!!

उस लफ्ज़ की
छूते ही बन जाए तेरी कविता
पिघल कर सारी स्याही