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रविवार, 22 जनवरी 2012

संघर्ष.......!!

तुम समुन्दर का किनारा हो
मैं एक प्यासी लहर की तरेह हूँ 
तुम्हें चूमने के लिए उठता हूँ 
 तुम चट्टान की तरेह हो 
वैसी ही खड़ी रहती हो 
मैं हर बार तुम्हें बस छू कर लौट जाता हूँ ...!!

शनिवार, 21 जनवरी 2012

मदिरा छलकी

भाप ..!!
जैसे अंतर से उठती
बेशुमार कणों
की मौन सिसकी

उष्मा ..!!
जैसे अंतर से उठती
सुलगते सपनो
की ज्वाला भभकी

तृष्णा ..!!
जैसे अंतर से रिसती
द्रवित मन
की मदिरा छलकी

खुश्बू ..!!
जैसे अंतर से महकी
तन की
इक इक नस चटकी

वेदना ..!!
जैसे अंतर से लिपटी
आँखों के पोखर
में काई सी जमी विरक्ति

क्षुधा ..!!
जैसे अंतर से बहती
शुष्क होंठों पर
प्रियतम के प्रेम की थपकी

तलाश.......!!!


कागज़ पर रेंगती कलम
रौंदती चली गयी
हर लफ्ज़ कों

तलाश थी ...!!

उस लफ्ज़ की
बन जाए इन्द्रधनुष
छलक कर सारी स्याही

तलाश थी ...!!

उस लफ्ज़ की
बन जाए अंगार
तड़प कर सारी स्याही

तलाश थी बस ...!!

उस लफ्ज़ की
छूते ही बन जाए तेरी कविता
पिघल कर सारी स्याही

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

स्पर्श .... शब्द :: नि:शब्द अनुभूति

खुद से ही गुफ्तगू करता
अहसास
परिहास
मधुमास
बिखरा हुआ इधर उधर
छिपा छिपा दिल के आस पास
स्पर्श
शब्द :: नि:शब्द अनुभूति
..................

माँ

आँचल में लिपटा
गोदी में सिमटा
ममता भरा वो चुम्बन
स्पंदन वो अहसास
पवन के मद्धम मद्धम झोंके सी
खींचती वो पालने की डौरी
सहला कर माथे कों
कानों में रस घोलती वो लोरी
उँगलियों से वो आँख में काजल लगना
स्पर्श
नि:शब्द अनुभूति
..............

मेरी बहना

वो लड़ना वो झगड़ना
बात बात पर रुलाना
शिकायत, वो डांट पड़ने पर
कनखियों से मुस्कुराना,वो चिढाना
दूज पर वो सजना, सवरना
चिडिया सा वो चेह्कना
आँगन में बिखरी वो सूरज की किरन
थाली में दिया , रोली, चावल, वो चन्दन
स्नेह भाव से वो पुरखों का गीत गाना
नाज़ुक सी उँगलियों से लगाना
रोली चंदन का टीका
वो चावल सजाना
परिहास वो स्पन्दन
स्पर्श
नि:शब्द अनुभूति

............

और तुम

सांझ ढलने का खुमार
किवाड़ की सांकल बजने का इंतज़ार
दिल का धडकना
वो रूठना, वो मनाना
बंद होंठों से गुनगुनाना
वो गजरे की महक
वो साँसों की कसक
चूडियों की खनखन
पायल की छनछन
आँखों में हलाहल
जैसे शाएर की ग़ज़ल
मेहँदी रचे हाथों का वो
स्पर्श
नि:शब्द अनुभूति

विनोद.....

शनिवार, 19 नवंबर 2011

बस यही मुझे याद नहीं....!


मुझे आज भी याद है
जब माँ बाबा को
किसी बिचौले ने
तुम्हारा और मेरा रिश्ता
सुझाया था
फिर मुझे तेरा फोटो
दिखाया था

मुझे आज भी याद है
मंदिर के प्रांगण में
सांझ ढले
देखने दिखाने का
बरसों पुराना तरीका
अपनाया था

मुझे आज भी याद है
मैंने जिद्द की थी
तुझ से चंद बातें
करने की, और
मुश्किल से तेरे बाबा को
मनाया था

मुझे आज भी याद है
गुलहड़ की झाड़ के पीछे
तेरा हाथ पकड़
कहा था मुझे पसंद हो
और मैं..??
तूने भी हौले से हाँ में अपना सर
झुकाया था

मुझे आज भी याद है
मंदिर से वापिस निकलते हुए
कनखियों से तुझे निहारा था
और तूने खुद को अपनी
झुकी हुई पलकों में
छुपाया था

मुझे आज भी याद है
मेरे घर की चौखट पर
पाँव धरते ही
तेरी पायल के हर घुंघरू ने
मेरे सपनों की चांदनी का गीत
गुनगुनाया था

वो तुम्हारी तस्वीर
वो चंद लम्हे
वो हाथों का स्पर्श
वो सर का झुकाना
वो नजरें चुराना
वो चांदनी का गीत
कब ज़िन्दगी का कारवां बन गए
बस यही मुझे याद नहीं

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

चिंदिया उड़ाने से क्या होगा



ख़तों को अब संभाल कर रखने से क्या होगा
दर्द को यूँ समेट कर रखने से क्या होगा

खुली हवा में ख़तों कों सांस ले लेने दो
यूँ पोटली में समेट कर रखने से क्या होगा

ख़त संजीदा लफ़्ज़ों से लिपट कसमसाते होंगे
यूँ आरजूओं के परिंदे क़ैद करने से क्या होगा

साल-हा-साल गुबार-ए-ज़ख्म थे शुमार ख़तों में
यूँ बरसों कों लम्हे में बदलने से क्या होगा

कहा था ना खतों - किताबत से दूरी रखो
यूँ छत पर अब चिंदिया उड़ाने से क्या होगा

रविवार, 18 सितंबर 2011

आवारा घूमना अच्छा लगता है


अब दिन में भी आँखे बंद रखना अच्छा लगता है
तुझे हर वक़्त ख्यालों में रखना अच्छा लगता है

कागज़ पर लफ़्ज़ों को बस तेरे लिए ही तराश्ता हूँ
जज़्बात बिखर ना जाएँ बंद होंठो से गुनगुनाना अच्छा लगता है

दिन भर बदहवास और कुछ मसरूफ रहता हूँ
मगर घर में अकेले तेरी तस्वीर से गुफ्तगू करना अच्छा लगता है

शीशे के चटकने से अब भी सिहर जाता हूँ
तेरे आखरी ख़त में भेजे सलाम पर हाथ का उठ जाना अच्छा लगता है

टुकड़े टुकड़े दिल के ज़र्रों को सहेजता रहता हूँ
जुनून उतर ना जाये तेरी चाहत का ज़ख्मों को कुरेदना अच्छा लगता है

मंजिल की तलाश में अब वक़्त ज़ाया नहीं करता हूँ
सांझ ढले तेरी गली में बस यूँ ही आवारा घूमना अच्छा लगता है

विनोद.....