यह विजेट अपने ब्लॉग पर लगाएँ

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

स्पर्श .... शब्द :: नि:शब्द अनुभूति

खुद से ही गुफ्तगू करता
अहसास
परिहास
मधुमास
बिखरा हुआ इधर उधर
छिपा छिपा दिल के आस पास
स्पर्श
शब्द :: नि:शब्द अनुभूति
..................

माँ

आँचल में लिपटा
गोदी में सिमटा
ममता भरा वो चुम्बन
स्पंदन वो अहसास
पवन के मद्धम मद्धम झोंके सी
खींचती वो पालने की डौरी
सहला कर माथे कों
कानों में रस घोलती वो लोरी
उँगलियों से वो आँख में काजल लगना
स्पर्श
नि:शब्द अनुभूति
..............

मेरी बहना

वो लड़ना वो झगड़ना
बात बात पर रुलाना
शिकायत, वो डांट पड़ने पर
कनखियों से मुस्कुराना,वो चिढाना
दूज पर वो सजना, सवरना
चिडिया सा वो चेह्कना
आँगन में बिखरी वो सूरज की किरन
थाली में दिया , रोली, चावल, वो चन्दन
स्नेह भाव से वो पुरखों का गीत गाना
नाज़ुक सी उँगलियों से लगाना
रोली चंदन का टीका
वो चावल सजाना
परिहास वो स्पन्दन
स्पर्श
नि:शब्द अनुभूति

............

और तुम

सांझ ढलने का खुमार
किवाड़ की सांकल बजने का इंतज़ार
दिल का धडकना
वो रूठना, वो मनाना
बंद होंठों से गुनगुनाना
वो गजरे की महक
वो साँसों की कसक
चूडियों की खनखन
पायल की छनछन
आँखों में हलाहल
जैसे शाएर की ग़ज़ल
मेहँदी रचे हाथों का वो
स्पर्श
नि:शब्द अनुभूति

विनोद.....

शनिवार, 19 नवंबर 2011

बस यही मुझे याद नहीं....!


मुझे आज भी याद है
जब माँ बाबा को
किसी बिचौले ने
तुम्हारा और मेरा रिश्ता
सुझाया था
फिर मुझे तेरा फोटो
दिखाया था

मुझे आज भी याद है
मंदिर के प्रांगण में
सांझ ढले
देखने दिखाने का
बरसों पुराना तरीका
अपनाया था

मुझे आज भी याद है
मैंने जिद्द की थी
तुझ से चंद बातें
करने की, और
मुश्किल से तेरे बाबा को
मनाया था

मुझे आज भी याद है
गुलहड़ की झाड़ के पीछे
तेरा हाथ पकड़
कहा था मुझे पसंद हो
और मैं..??
तूने भी हौले से हाँ में अपना सर
झुकाया था

मुझे आज भी याद है
मंदिर से वापिस निकलते हुए
कनखियों से तुझे निहारा था
और तूने खुद को अपनी
झुकी हुई पलकों में
छुपाया था

मुझे आज भी याद है
मेरे घर की चौखट पर
पाँव धरते ही
तेरी पायल के हर घुंघरू ने
मेरे सपनों की चांदनी का गीत
गुनगुनाया था

वो तुम्हारी तस्वीर
वो चंद लम्हे
वो हाथों का स्पर्श
वो सर का झुकाना
वो नजरें चुराना
वो चांदनी का गीत
कब ज़िन्दगी का कारवां बन गए
बस यही मुझे याद नहीं

रविवार, 16 अक्तूबर 2011

चिंदिया उड़ाने से क्या होगा



ख़तों को अब संभाल कर रखने से क्या होगा
दर्द को यूँ समेट कर रखने से क्या होगा

खुली हवा में ख़तों कों सांस ले लेने दो
यूँ पोटली में समेट कर रखने से क्या होगा

ख़त संजीदा लफ़्ज़ों से लिपट कसमसाते होंगे
यूँ आरजूओं के परिंदे क़ैद करने से क्या होगा

साल-हा-साल गुबार-ए-ज़ख्म थे शुमार ख़तों में
यूँ बरसों कों लम्हे में बदलने से क्या होगा

कहा था ना खतों - किताबत से दूरी रखो
यूँ छत पर अब चिंदिया उड़ाने से क्या होगा

रविवार, 18 सितंबर 2011

आवारा घूमना अच्छा लगता है


अब दिन में भी आँखे बंद रखना अच्छा लगता है
तुझे हर वक़्त ख्यालों में रखना अच्छा लगता है

कागज़ पर लफ़्ज़ों को बस तेरे लिए ही तराश्ता हूँ
जज़्बात बिखर ना जाएँ बंद होंठो से गुनगुनाना अच्छा लगता है

दिन भर बदहवास और कुछ मसरूफ रहता हूँ
मगर घर में अकेले तेरी तस्वीर से गुफ्तगू करना अच्छा लगता है

शीशे के चटकने से अब भी सिहर जाता हूँ
तेरे आखरी ख़त में भेजे सलाम पर हाथ का उठ जाना अच्छा लगता है

टुकड़े टुकड़े दिल के ज़र्रों को सहेजता रहता हूँ
जुनून उतर ना जाये तेरी चाहत का ज़ख्मों को कुरेदना अच्छा लगता है

मंजिल की तलाश में अब वक़्त ज़ाया नहीं करता हूँ
सांझ ढले तेरी गली में बस यूँ ही आवारा घूमना अच्छा लगता है

विनोद.....

रविवार, 31 जुलाई 2011

तेरी याद का फूल


आज फिर ज़हन के
इन बंद दरीचों के तले
दिल में सोये हुऐ
अहसास ने करवट बदली
और चुपके से महक उठा
तेरी याद का फूल

ज़ख्म ने आंख मली
याद ने करवट बदली
गुनगुनाने लगे
मज़रूह तम्मनाऔ के लब
रूह के जिस्म से नग़मात के
धारे फूटे

वक्त की धूल में डूबे हुऐ
यादों के चिराग़
तेरे चेहरे की रौनक को
ज़िला देने लगे

मेरी पलकों से टपकते हुऐ
अश्कों के मोती
मुझे मेरी मोहब्बत का
सिला देने लगे


मुद्दतों बाद...

इक अख़बार के पन्ने पे
मुझे तेरी तसऽवीर नज़र आई
किसी और के साथ

तेरे पहलू में कोई
नौजवां बैठा था
नये तेवर, नये अंदाज़,
नये तौर के साथ

करवटें लेने लगी
दर्द की लहरें दिल में
यादों की राख फिज़ां में
बिखरने सी लगी

ज़हन में गूंज उट्ठी
तेरी खनकती हुई आवाज़
तेरी तहरीर निगाहों में
उभरने सी लगी

तेरी तस्वीर ने यह राज़
मगर फाश किया
कि लोग किस तरह
बदल जाते हैं धीरे धीरे
मोम की तरह बदन
उनका पिघल जाता है
और इक नये सांचे
ढल जाते हैं धीरे धीरे

आज फिर ज़हन के
इन बंद दरीचों के तले
दिल में सोये हुऐ
अहसास ने करवट बदली
और चुपके से महक उठा
तेरी याद का फूल


विनोद………..

रविवार, 24 जुलाई 2011

लफ्ज़ बदल जाया करते थे


हर लम्हे के साथ खुद बखुद
मेरी नज़्म के लफ्ज़ बदल जाया करते थे


सावन के महीने में यही लफ्ज़
बारिश की बूंदों में बदल जाया करते थे


सूरज की बे - इन्तहा तपिश में
दरख्त के साये में बदल जाया करते थे


अमावस के घुप अंधेरों में यही लफ्ज़
चिरागों की रौशनी में बदल जाया करते थे


बियाबान रास्तों पे जब भी हुआ अकेला
लफ्ज़ रहगुज़र में बदल जाया करते थे


दिलबर के ज़िक्र की महक से यह लफ्ज़
पाज़ेब की झंकार में बदल जाया करते थे


विनोद.....

सपनो के घाव


वो औरत
कहाँ से पाए दो ह्रदय
एक क्षण पाषाण
दुसरे क्षण ममता
जिस को मैं और मेरी बहना
माँ कहती थी

दिन भर
पत्थरों को तोड़
शाम ढले
रोटी के चंद टुकड़े
बीन लाया करती थी

माँ की तो आधा पेट खा कर
सोने की आदत सी थी
मुट्ठी में बंद
सपनो के घाव
सहने की विरासत सी थी

मुझे तो
मेरी माँ ने
उधार मांग
चांदी के
चम्मच से
पहला निवाला खिलाया था

नियति बदली नहीं
पत्थरों के शहर में
निवाला जुटाने में
फिर उधार चुकाने में
वही किस्सा दोहराया था
माँ को आधा पेट खा कर सुलाया था

विनोद.....

जन गण मन


क़तल डाका और चीरहरण
हर तरफ बस चरित्रहनन
कलम भी बेबस और सन्न
चुप्पी, चीखें, घुटन का संग
हर तरफ सन्नाटे का काला रंग
जकड़े जबड़े , सबके मुखबन्द
हर हाथ में बस लाठी बल्लम
जिंदा लाशों की सड़ी सी गंध
सुबक रहा सारा जन गण मन


चुप चुप सी चूड़ी की छन छन
गुमसुम सी पायल की छम छम
कम्पित धरती का , कण कण
चहूँ और बादल की , घन घन
ह्रदय पर हथोड़ो की , ठन ठन
काला धन , खनके खन खन
भ्रष्ट हमाम में सब नंग धड़ंग
तम में विसर्जित , क्षण क्षण
सुलग रहा सारा जन गण मन


बन्दूको के साए में अब चलते शासन
द्रोपदियो के चीरहरण करते दुशासन
सीताओं के हरण करते हज़ारों रावण
मुल्कों का सौदा करते यह जयचंद
खो गए अंधियारे में कर्ण विभीषण
कमरे के अंदर सुरा पंडाल में सत्संग
विद्या का व्यापार करते यह गुरुजन
तड़प रहा सारा जन गण मन

विनोद.....

शनिवार, 23 जुलाई 2011

फिर मैं कैसे दीप जलाऊं


दर दर दीप जला कर
तुम ने अपनी अमावस पूनम कर ली
बहुतेरे आँगन अब भी ऐसे
जहां दीप जला ना मनी दिवाली
फिर मैं कैसे दीप जलाऊं

नभ ने सब तारे
जड़ डाले तेरे सतरंगे आँचल में
वीणा की झंकार सुरीली
बस रे गयी तेरी पायल में

अमावस से जो चन्दा रूठा
तेरे माथे की बिंदिया बन बैठा
बहुतेरे अब भी ऐसे
हाथों में रची ना मेहंदी
माथे पर सजी ना चन्दन रोली
फिर मैं कैसे दीप जलाऊं

भ्रमर सारे मधुरस
घोल गए तेरे अधरों में
मधुशाला की हाला
डोल गयी तेरे नयनों में
पुष्पों की खुशबू
बस रे गयी तेरी साँसों में

बहुतेरे अब भी ऐसे
आँखों के पनघट रो रो रीते
मन पुस्तक के पन्ने खाली
फिर मैं कैसे दीप जलाऊं

विनोद.....

मंगलवार, 19 जुलाई 2011

निबंध


“आँखों देखे मेले का हाल”
स्कूल में आठवीं क्लास में
मास्टर जी अक्सर यह निबंध
लिखवाया करते थे
एक कल्पना कों
लिखना होता था
शब्दों में
दो पन्नों में

आज बरसों बाद
वैसी ही कल्पना
तेरे और मेरे संबंधों
तेरे और मेरे बीच के
खोखले होते रिश्तों पर
फिर एक निबंध लिखना है

मेले और रिश्तों में
तेरे मेरे रिश्तों में
काफी समानताएँ हैं
पल दो पल
मिलना जुलना
दुआ सलाम
और फिर अपने अपने
खिलोनों से
ख्यालों से
रास्ते भर गुफ्तगू

विनोद.....

सोमवार, 18 जुलाई 2011

मंजिल कोई मील का पत्थर नहीं होती


मंजिल कोई
मील का पत्थर
नहीं होती
मुसाफिर की कोई
मंजिल नहीं होती

मंजिल तो बस
एक पड़ाव है
अतीत आज और भविष्य
की संकरी गलियों से
गुज़रते
ज़िन्दगी के रास्तों का

उन रास्तों का
जिन्होंने मुझे
अत्तीत से निकल
आज के पड़ाव तक
हर क़दम
नया अहसास जगाया

थके जब
पाँव मेरे
तलवों को सहलाया
बस बढ़ते चलो का
हर बार
नया गीत गुनगुनाया

विकट बाधओं में
भटक गया जब
इन्ही रास्तों ने
मेरा साथ निभाया
हर बार
नया विश्वास जगाया

रास्ता कोई
बदलते मौसम की
सहर नहीं
सागर में सिमटी
लहर नही

रास्ता एक दृष्टि एक सृष्टि है
नए पगध्वनी के संगीत का
संगीत की खुश्बू
परिधि में क़ैद नहीं होती
इरादों की
कोई मंज़र नहीं होती
मंजिल कोई
मील का पत्थर नहीं होती

विनोद.....

फर्क समझ आने लगा है ....


मुझे अब
आदमी और
आम आदमी होने
का फ़ख्र
और फर्क
समझ आने लगा है

मेरे सर पर
लादी गयी ईंटों
से ऊंचे होते
यह मकान
और अपनी झोंपड़ी
में फर्क
समझ आने लगा है

तंदूर में
सिकते मख्खनी पराठे
मेरी थाली
में परोसे मोटे चावल
पानी में तैरती
अरहर की दाल
में फर्क
समझ आने लगा है

होटल में
खाने के बाद
बिल चुकाने पर
प्लेट में छोड़ी रेज़गारी
से ग्राहक के चेहरे के फ़ख्र
और अपने दीन चेहरे
में फर्क
समझ आने लगा है

राष्ट्रमंडल खेलों में
सुना है वेट लिफ्टिंग
भी प्रतियोगिता है
तमगो के साथ बजते
राष्ट्रीय गीत
और स्टेशन पर
मुसाफिरों के बोझ उठ्ठाने
में फर्क
समझ आने लगा है

मेरा भारत
एक गणतंत्र देश है
मेरे वोट से ही
बनती हैं सरकारें
वोट मांगने
और वोट देने
में फर्क
समझ आने लगा है

विनोद.....

रविवार, 17 जुलाई 2011

यादों के कारवां


मेरी यादों के कारवां
बस उस खम्बे तक
ठहर जाते हैं जो
मेरे तुम्हारे घर से
बराबर की दूरी पर गढ़ा है

कभी मैं कभी तुम
उस खम्बे से पीठ के
सहारे खड़े होते थे
क्या क्या बतियाते थे

पता नहीं किस बात पर
शिकवा करते थे
पता नहीं किस बात पर
झल्लाते थे
पता नहीं किस बात पर
मुस्कुराते थे

हम में होड़ होती थी
तय वक़्त से पहले पहुँचने की
खम्बे के साथ पीठ टिका
इंतज़ार करने की
और मैं
हर बार हार जाता था

बिजली का खम्बा
आज भी वहीं गढ़ा है
मेरे तुम्हारे घर से
बराबर की दूरी पर
पीठ टिकाये खड़ा हूँ
मैं और हमारा खम्बा
आज तेरे हार जाने की इंतज़ार में

विनोद.....

सरफरोशी के गीत अब गाये कहाँ

मेरे भारत में अब सिर्फ कौरव बसते
पांडव और कृष्ण कहाँ

चहूँ और अब शकुनी का तांडव
अर्जुन का गांडीव कहाँ

होलिका के गोदी में बैठी भारत माता
पुकारे मेरा प्रहलाद कहाँ


लोकतंत्र कों हर लिया राजनीती के रावण ने
जन सेवक सब बने मारीच यहाँ

जयचंदों और जाफर ने जकड़ा मेरा भारत
ढूँढे मेरा पृथ्वीराज कहाँ

ज़फर अब परदेशों में दफनाए जाते
भारत में दो गज़ ज़मीन कहाँ

जेलों में अब जमघट नेता और दलालों का
सरफरोशी के गीत भगत अब गाये कहाँ

विनोद.....

हाथ भर छू लेने से


मैं जानता हूँ
सागर की इन सतही लहरों की तरह
शरमाई सी चंचलता तुम में है

मैं जानता हूँ
सागर की तह में छिपी ख़ामोशी की तरह
गहराई सी तटस्थता तुम में है

मैं जानता हूँ
दूर आकाश में विचरते बादलों की तरह
अलसाई सी स्वच्छन्दता तुम में है

मैं जानता हूँ
सागर के छोर से उगते सूरज की तरह
अरुणाई सी निर्मलता तुम में है

मैं जानता हूँ
पवन की मंद मंद बहती बयार की तरह
गदराई सी मादकता तुम में है

फिर भी कभी
लहरों के भंवर में घिर जाओ
समुद्र के समर में घिर जाओ
अधेरों के मंज़र में घिर जाओ
मेघ के कहर में घिर जाओ

तुम जानते हो
मेरे मन के स्पंदन कों
मेरे तन के समर्पण कों
बस हाथ भर छू लेने से
लौट आएगी तुम्हारी नवचेतना .........!!


विनोद.....

रिश्ते एक संबोधन ..!!


शरीर घायल या
फिर मन घायल
दवा और दुआ
पत्थरों के इस शहर में
इनका मोल चुकाना होगा

भिखारी और पुजारी भी
बिना भीख , दक्षिणा
दुआ नही अब देते
मोल चुकाना होगा

रिश्ते बस एक संबोधन
और शब्दों में सिमट गए
मन अब मंदिर नहीं
सागर की लहर नही
बंजर धरती जैसे चटक गए

बरामदे में चारपाई पर
बैठी बूढ़ी अम्मा की
दूआयें तब्दील हो गयी
फैले आँचल में
आँखों में ममता
कोरों में आंसू
अब नहीं छलकते


विनोद.....

चश्म-ए-पैमाना बूँद बूँद रिसने लगा है


रगों में दोड़ता खून अब धीरे धीरे सुस्ताने लगा है
दिल में उमड़ता सैलाब अब धीरे धीरे थमने लगा है

बहक जाते थे चश्म कभी एक अदद दीदार से जिन के
गर्द से ज़र्द चश्म-ए-पैमाना बूँद बूँद रिसने लगा है

सिहर जाता था बदन कभी गर्म साँसों की महक से जिन के
बर्फीली यादों में ढका बदन मोम सा पिघलने लगा है

शबनम तैर जाती थी ज़ुल्फ़ के झटकने की अदा से जिन के
बारिश की फुहार से भी वोह चेहरा अब झुलसने लगा है

ग़ज़ल बनती थी लब-ए-लफ्ज़ की रवानी से जिन के
अशआर का हर कलाम अब काफिये पे रुक टूटने लगा है

धड़कने रुक जाती थी; घड़ी भर देर से आने से जिन के
सहर से शाम तक का फासला कुछ और बढ़ने लगा है

लिखी थी नज़म-ए-ज़िंदगी झपकती पलकों के तरनुम से जिन के
भरी महफ़िलों में भी अब 'विनोद' तनहा भटकने लगा है

विनोद.....

रविवार, 10 जुलाई 2011

खाप पंचायत

"खाप पंचायत" यह नाम अब तक सभी सुन चुके होंगे। पिछले कुछ दिनों से यह काफी चर्चा में है। इनके द्वारा जारी किये गए अनोखे फ़रमान जिन्हें लोगों ने तुगलकी फ़रमान की संज्ञा दी है ... मुझे प्रेरित किया कि कुछ लिखूँ



खाप पंचायत से छुपने का
कहीं कोई ठौर ठिकाना तो होगा

सुलगती धरती से हट ,कहीं
आँचल सा कोमल साया तो होगा

सर्द खामोश नज़ारे, मगर
गुनगुनाता स्वपन तो होगा

इस जहां से उस जहां में
कहीं कुछ फर्क तो होगा

कर लूँ श्रृंगार उस की चाहत का
चाँद की आँखों सा दर्पण तो होगा

ठिठुरते बर्फीले अँधेरे सही
किरणों में कुछ कंपन तो होगा

/./././././././././././,/

उफ़ ! चाँद की नियति, बेचारा
सौरमंडल की खाप में उलझा होगा

रातों में लुक छुप छत पर
दिन उगने तक प्रेम रचाता होगा

उस जहां की खाप के गंडासे से कट
अमावस कों दफनाया जाता होगा

रुढ़ियों की चादर के कफ़न में ढक
हर चाँद फतवों की कब्र में सोया होगा


विनोद.....

शनिवार, 9 जुलाई 2011

यादों की दस्तक





पब्लिक स्कूल, नर्सरी, के.जी. या फिर क्लास वन
कहाँ था हमारे वक़्त आज के जैसा यह चलन

कच्ची, पक्की, और फिर पहली कक्षा
ना कोई स्कूल बस, ना था कोई रिक्शा

कभी हाथ से उछालते, कभी मारते ठोकर
रास्ते के पत्थर ही थे हमारे हमसफ़र

पुराने पाजामे से सिला स्कूल का बस्ता
घर से स्कूल तक चलते कदम रफ्ता रफ्ता

हाथ में लकड़ी की तख्ती; डोरी से झूमती दवात
काठ की कलम से अक्षर टांकती सारी जमात

डोरी से बंधे पालिश की डिब्बी के ढक्कन
इसी मोबाईल फोन से खेला था मेरा बचपन

छे: सात बच्चों से भरा पूरा परिवार होता था
हर घर के सामने चारपाईओं का अम्बार होता था

औरतें तंदूर के गिर्द ख़बरों से भरी अखबार होती थी
मर्दों में चारपाई पर बैठे यूँ ही कोई तकरार होती थी

लडकियां क्रोशिये या सलाईओं से क्या क्या बुना करती थी
चुपके चुपके अपनी शादी की बातें मन में मुस्काते सुना करती थी

अब तो हम अचानक कब कहाँ से यहाँ तक पहुँच गए
मौसी, चाचा, माँ, सब; आंटी, अंकल, माम में बदल गए

पिट्ठू, छुपन छुपाई और लड़कियों के शतापू कहीं खो गए
कंचे, लट्टू, सब; फेसबुक, ट्विटर, ऑरकुट में कहीं खो गए

भीड़ भरे चौराहों में जब कभी खुद को अकेला पाता हूँ
यादों की दस्तक को बचपन के दरवाज़े तक ले जाता हूँ

………वक़्त



वक़्त कब किसी का हुआ
फिसलता रहा
घड़ी की हर धड़कन
के साथ साथ

मगर हम भी थे जिद्दी
समुन्दर की लहरों की तरह
टकराते रहे वक़्त की चट्टानों
से बार बार

तुम मुझे पागल समझते रहे
मगर चुरा लेता था मैं
तेरे बदन का एक कण
फैला देता था लौटते हुए
यहीं आस पास

आउंगा, कल फिर आउंगा
ज़मी पर बिखरे हुए कणों
की खुश्बू पर लहराते हुए
मैं बार बार

विनोद……….
.

अभिलाषा…………



मैं हमेशा से ही डरता आया हूँ
पूनम की रात से
जब जब मैंने
समुन्दर की लहरों कों
मचलते देखा
मन है की संभाले नही संभलता

पता नही क्यूँ
हर अमावास की शाम
कदम खुद बखुद
समुन्दर की तरफ
बढे चले जाते हैं ....!

उदास थरथराती लहरें
डग -डगमाते क़दमों से
किनारों की चट्टानों से टकरा कर
टूट जाती हैं. बिखर जाती

बहुत सकून मिलता है
धरती पर ना सही
कोई तो है
इक आम इंसान
की चकनाचूर होती
आशाओं का साथी ……………….


विनोद………..

अपना बचपन ढूँढ़ रहा हूँ


अपना बचपन ढूँढ़ रहा हूँ
इस महानगर में मैं अपना वो घर ढूँढ़ रहा हूँ
महानगर में आज मैं अपना बचपन ढूँढ़ रहा हूँ
मेरी बारी लगती थी हर सोमवार
घर की सारी चारपईओ की दावन खींचने की
दावन खींचते चुभ जाया करता था
किसी एक उंगली में शहतीर सा छोटा सा तिनका
और माँ चश्मा लगा सुई की नोक से
उघाड़ा करती थी ऊँगली की सतह कों
हल्का सा खून रिसता था
ऊँगली से रिसता खून
और मैं अपने ही खून कों चूस लिया करता था
इस महानगर में आज हर आदमी दुसरे का खून चूस रहा है


इस महानगर में मैं अपना वो घर ढूँढ़ रहा हूँ
महानगर में आज मैं अपना बचपन ढूँढ़ रहा हूँ
तब घरों के नंबर नहीं होते थे
मोहल्ले होते थे गली के नाम होते थे
बनवारी लाल जी
शाम मोहल्ला नमक वाली गली
डाकिये से ले कर बच्चे तक
मुसाफिर कों बनवारी लाल जी का
चश्मे से ले कर अंगोछे का
रंग बता दिया करते थे
आज बी. एल. नौंवी मंजिल की बालकनी में खड़ा अपनी पहचान ढूंढ रहा है

इस महानगर में मैं अपना वो घर ढूँढ़ रहा हूँ
महानगर में आज मैं अपना बचपन ढूँढ़ रहा हूँ
अंगीठी में दहकते लाल अंगारे
कमरे में रसोई नुमा वो कोना
माँ के हाथों में बेलन और आँखों में रौब
तवे पे फूलती वो रोटी
थाली में हरी मिर्च आम का अचार
प्याज़ का तड़का लगी मूंग की दाल
हम सब का पहले मैं - पहले मैं का शोर
महानगर में अब सब मेक डानल्ड के फास्ट फ़ूड में सिमट रहा है
विनोद………..